भगवान श्रीराम के जीवन काल का संशिप्त परिचय

अयोध्या के राजा श्री दशरथ के 4 सुपुत्रों में सबसे बड़े पुत्र थे भगवान श्रीराम। राजा दशरथ की 3 पत्नियाँ थी- रानी कौशल्या,रानी सुमीत्रा और रानी कैकयी। श्रीराम के 3 अनुज भाई भी थे लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। श्रीराम रानी कौशल्या के सुपुत्र थे। रानी सुमीत्रा के लक्ष्मण और शत्रुध्न 2 सुपुत्र थे। अर्थात रानी कैकयी के पुत्र का नाम भरत था।

लक्ष्मण की धर्मपत्नी का नाम उर्मिला, शत्रुध्न की का नाम श्रुतकीर्ति और भरत की पत्नी का नाम मांडवी था। सीता और उर्मिला राजा जनक की पुत्रियाँ थी और मांडवी और श्रुत‍कीर्ति कुशध्वज की पुत्रियाँ थी। लक्ष्मण के 2 सुपुत्र अंगद तथा चंद्रकेतु थे।

भगवान राम का विवाह मिथिला के नरेश राजा जनक की सुपुत्री सीता से हुआ। माता सीता के स्वयंवर में महर्षि रावण भी आया था। विवाह के बाद कैकयी के कहने पर राम को दशरथ ने 14 वर्ष के वनवास पैर भेज दिया। वनवास में माता सीता और उनके छोटे भाई लक्ष्मण जी भी उनके साथ गए। इधर माता कैकयी ने भरत को अयोध्या का राजा बनाने का कार्येक्रम शुरू किया।

आदिवासियों के ईशवर : राम ने 14 वर्ष वनों में रहकर संपूर्ण भारत में भ्रमण कर भारतीय आदिवासियों, जनजाति, पहाड़ी और समुद्री लोगों के बीच सत्य, प्रेम, मर्यादा और सेवा का संदेश पहुँचा दिया । यही कारण था की जब श्रीराम का रावण से युद्ध हुआ तो सभी तरह की अनार्य जातियों ने श्रीराम का युद्ध में साथ दिया। यह वह समय था जब लोगों में किसी भी प्रकार की जातिवादी सोच नहीं हुआ करती थी। लोग सिर्फ 2 तरह की सोच में ही बंटे थे- सुर और असुर जिन्हें देव और दानव कहा जाता हैं। सुर के सहयोगी यक्ष, गंधर्व, वानर आदि थे परंतु असुरों के सहयोगी राक्षस, दानव, पिशाच आदि थे। वनवास के दौरान लक्ष्मण जी ने रावण की बहिन सूर्पणखा की नाक भी काट दी थी। माता सीता के स्वयंवर में अपनी हार और सूरपर्णखा की नाक कटने का बदला लेने के लिए रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया। वनवास के दौरान ही श्रीराम को माता सीता से 2 पुत्र प्राप्त हुए- लव और कुश। एक शोधानुसार लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए ‍जो प्रशंसनीय महाभारत युद्ध में कोरवों की तरफ से लड़े थे।

श्रीराम ने सीता माता को दुस्ट रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए संपाति,महावीर हनुमान, सुग्रीव, विभिषण, मैन्द, द्विविद, जाम्बवंत, नल, नील, तार, अंगद, धूम्र, सुषेण, केसरी, गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कम्पन (गवाक्ष), दधिमुख, गवय और गन्धमादन आदि की सहायता से एक सेतु का निर्माण किया और लंका पर चढ़ाई कर दी। श्रीलंका में घोर युद्ध हुआ और पराक्रमी रावण का वध हो गया। तब पुष्पक विमान द्वारा श्रीराम सीता माता सहित पुन: अयोध्या वापस आ गए।

इस पुरे घटनाक्रम में महावीर हनुमान ने श्रीराम का अत्यन्त साथ दिया इसलिए हनुमानजी श्रीराम के अनन्य सहायक और भक्त सिद्ध हुए। भगवान श्रीराम को महावीर हनुमान ऋष्यमूक पर्वत के पास मिले थे।

महत्वपूर्ण घटनाक्रम: महान गुरुवर वशिष्ठ से शिक्षा-दिक्षा लेना, श्री विश्वामित्र के साथ वन में ऋषियों के यज्ञ की रक्षा करना और राक्षसों का वध, श्रीराम का स्वयंवर, शिव धनुष तोड़ना, वनवास, केवट से मिलन, लक्ष्मण जी द्वारा सूर्पणखा की नाक काटना, खर और दूषण का वध, लक्ष्मण जी के द्वारा लक्ष्मण रेखा का निर्माण, स्वर्ण हिरण-मारीच का वध, सीता हरण, जटायु से मिलन।

कबन्ध का वध, शबरी से मिलन, महावीर हनुमान से मिलन, सुग्रीव से मिलन, दुन्दुभि और बाली का वध, संपाति द्वारा सीता का पता बताना, अतिसुन्दर अशोक वाटिका में महावीर हनुमान द्वारा सीता माता को राम की अंगुठी देना, महावीर हनुमान द्वारा श्रीलंका दहन, सेतु का पूर्ण निर्माण, लंका में रावण से युद्ध, लक्ष्मण का मुर्छित होना, हनुमान द्वारा संजीवनी लाना और रावण का वध, पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर वापसी।

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